यह कहानी उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव “चंद्रपुर” की है, जहाँ एक पुरानी वीरान हवेली पिछले 40 सालों से खंडहर बनकर खड़ी थी। कहते हैं, उस हवेली में रात के समय किसी के चीखने की आवाजें आती थीं। गाँव के बुजुर्ग कहते, “उस हवेली के अंदर अंधेरा नहीं, मौत रहती है।”
कोई भी गाँववाला रात के समय उस हवेली के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था।
एक दिन शहर से चार दोस्त – रोहित, कबीर, निधि और आयुष – गाँव में छुट्टियाँ मनाने आए। वे सभी कॉलेज में पढ़ते थे और हॉरर कहानियों के शौकीन थे। गाँव वालों से हवेली के बारे में सुनकर उनके अंदर एक अजीब सी जिज्ञासा जागी।
रोहित ने कहा, “एक रात उस हवेली में चलकर देखते हैं, आखिर डर किस बात का है?”
कबीर हँसते हुए बोला, “भूत-वूत कुछ नहीं होता, ये सब लोगों के दिमाग का वहम है।”
निधि थोड़ी डरी हुई थी लेकिन दोस्तों के कहने पर मान गई। तय हुआ कि अगली रात वे सभी टॉर्च, कैमरा और कुछ खाने-पीने का सामान लेकर हवेली में जाएंगे।
अगली रात ठीक 12 बजे, चारों दोस्त हवेली के पुराने दरवाजे को धक्का देकर अंदर घुसे। दरवाज़ा जोर से चरमराया और एक अजीब सी सड़न की गंध पूरे वातावरण में फैल गई। हवेली के अंदर अंधेरा, धूल और मकड़ियों का जाल था।
दीवारों पर समय की मार साफ दिख रही थी। टॉर्च की रोशनी में उन्हें एक बड़ा हॉल दिखाई दिया जिसमें टूटी-फूटी कुर्सियाँ और एक पुराना झूमर लटक रहा था।
आयुष ने हँसते हुए कहा, “ये तो एकदम फिल्मी सेट जैसा लग रहा है।”
लेकिन तभी… एक धीमी सी सिसकी सुनाई दी।
“सुनो… ये आवाज़ कहाँ से आई?” – निधि ने घबराते हुए पूछा।
सभी चुप हो गए। उन्होंने फिर ध्यान से सुना – दीवारों के पीछे से किसी औरत के रोने की आवाज़ आ रही थी।
रोहित ने हिम्मत दिखाते हुए उस दिशा में टॉर्च डाली। एक पुराना दरवाज़ा दिखा, जो थोड़ा खुला हुआ था। जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, एक ठंडी हवा का झोंका आया और सभी के रोंगटे खड़े हो गए।
अंदर एक छोटा कमरा था – कमरे में एक पुराना झूला और ज़मीन पर एक टूटी हुई गुड़िया पड़ी थी। अचानक वह झूला अपने आप हिलने लगा।
आयुष ने तुरंत सब कुछ कैमरे में रिकॉर्ड करना शुरू किया। तभी निधि की नज़र दीवार पर बनी एक पुरानी पेंटिंग पर पड़ी – उसमें एक औरत और एक छोटी बच्ची की तस्वीर थी। पर अजीब बात ये थी कि औरत की आँखों से लाल रंग की बूंदें जैसे बह रही हों।
निधि ने धीरे से कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है जैसे ये औरत हमें देख रही है…”
अचानक उसी वक्त झूले की आवाज़ बंद हो गई। सन्नाटा छा गया। और तभी – झूले के नीचे से किसी के पाँव दिखाई दिए।
चारों दोस्त एक झटके में चौंक गए।
अब उन्हें यकीन हो गया कि वहाँ कुछ था। वे भागकर हॉल की तरफ़ लौटे लेकिन रास्ता अजीब तरीके से बदल चुका था। जिससे वे अंदर आए थे, अब वहाँ एक दीवार थी।
कबीर बोला, “ये कैसे हो सकता है? दरवाज़ा तो यहीं था!”
हवेली अब बदल चुकी थी। दीवारों पर खून के निशान उभर आए थे और हर कोने से किसी के फुसफुसाने की आवाजें आ रही थीं।
“तुमने हमें क्यों जगाया…?” एक फटी हुई औरत की आवाज़ गूंजी।
रोहित को दीवार पर एक पुराना पेपर चिपका मिला। उसने पढ़ा –
“1975 – इस हवेली की मालकिन सविता देवी और उनकी बेटी को उनके पति ने मार डाला था। कहते हैं, उनकी आत्मा आज भी न्याय की तलाश में भटक रही है। जो भी इस हवेली में आता है, उसे वे अपनी कहानी सुनाए बिना नहीं जाने देतीं।”
तभी कमरे में वह औरत दिखाई दी – वही जो पेंटिंग में थी – लेकिन अब उसकी आँखों से खून टपक रहा था, और हाथों में एक बच्ची की टूटी गुड़िया थी।
वह औरत धीरे-धीरे रोहित के पास आई और कहा, “क्या तुम मेरी मदद करोगे…? क्या मेरी कहानी दुनिया को बताओगे…?”
रोहित काँपता हुआ बोला, “हाँ… हम तुम्हारी कहानी सबको बताएँगे… कृपया हमें जाने दो।”
औरत ने हाथ आगे बढ़ाया, रोहित ने वह पेपर उसके हाथ में रखा। कुछ पल बाद हवेली की दीवारें फिर से सामान्य हो गईं, खून के निशान गायब हो गए और दरवाज़ा वापस अपनी जगह पर था।
चारों दोस्त भागकर हवेली से बाहर निकले।
अगली सुबह, रोहित ने इंटरनेट पर उस औरत की पूरी कहानी एक ब्लॉग में लिखी। पोस्ट का टाइटल था – “अंधेरे का घर – एक अधूरी आत्मा की पुकार”। कहानी वायरल हो गई। लोगों को पहली बार उस हवेली का सच पता चला।
पर उस रात रोहित के लैपटॉप स्क्रीन पर अचानक एक लाइन अपने आप टाइप हुई –
“धन्यवाद… अब मैं जा रही हूँ…”
लेकिन स्क्रीन के कोने में वही औरत की धुंधली तस्वीर कुछ पल के लिए दिखी… और फिर गायब हो गई।

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