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  • आरशातली सावली

    आरशातली सावली

    एका डोंगरकड्याच्या पायथ्याशी वसलेलं एक लहानसं गाव होतं – रानवाडी. गाव खूपच शांत आणि निसर्गरम्य होतं, पण त्याच्या एका टोकाला एक जुना वाडा होता – “दुर्गा वाडा”. गावकरी म्हणायचे की तिथं काहीतरी अघोरी घडतं. संध्याकाळी सूर्य मावळला की कोणीही त्या दिशेनं जात नसे.

    राहुल नावाचा एक तरुण संशोधनासाठी गावात आला होता. तो शहरात पत्रकार होता आणि त्याला अशा रहस्यमय जागांवर लिहायचं फार वेड होतं. गावात येताच त्याने दुर्गा वाड्याबद्दल विचारणा केली, पण लोक चटकन बोलणं टाळू लागले. काही जणांनी सांगितलं की त्या वाड्यात एका बाईची आत्मा अडकून आहे – दुर्गा बाई, जिचं ३० वर्षांपूर्वी दु:खद मृत्यू झालं होतं.

    राहुलला हे सगळं अंधश्रद्धा वाटलं. त्याने ठरवलं की तो स्वतः त्या वाड्यात जाऊन सत्य शोधेल. एका चांदण्या रात्री, हातात टॉर्च आणि कॅमेरा घेऊन तो वाड्याकडे निघाला. वाड्याच्या दारापाशी पोहोचल्यावर त्याला एक विचित्र थंडी जाणवली, जणू काही शरीरात काटा उठावा.

    दार ढकलून तो आत गेला. वाड्यात सगळीकडे धूळ, जळक्या फर्निचरचे तुकडे आणि कोळ्यांची जाळी होती. पण सगळ्यात जास्त विचित्र गोष्ट होती – शांततेमधून येणाऱ्या पावलांचे आवाज. राहुलने टॉर्च समोर केला, पण काहीच दिसलं नाही. तो चालत चालत आतल्या खोलीपर्यंत गेला. तिथं एक जुना आरसा होता.

    राहुल त्याच्याकडे पाहू लागला आणि तेवढ्यात त्याला आरशात मागे उभी असलेली एक सावली दिसली – एक साडी नेसलेली बाई, डोक्यावर केस झाकलेले, आणि डोळ्यांत थेट त्याच्याकडे रोखलेली नजर. त्याने मागे वळून पाहिलं, पण तिथं कोणीच नव्हतं. तो घाबरला, पण अजून थोडा वेळ थांबायचं ठरवलं.

    तेवढ्यात त्याला हळूच कुजबुज ऐकू आली – “का आलास तू इथे…? मला शांतता हवी आहे…” त्याने कॅमेरा चालू केला, पण सगळं धूसर दिसत होतं. आरशात पुन्हा ती बाई दिसली, आणि यावेळी तिच्या डोळ्यांतून रक्त येत होतं. राहुलने धावत बाहेर जायचा प्रयत्न केला, पण वाड्याचं दरवाजं बंद झालं होतं.

    त्याच क्षणी सगळं शांत झालं. त्याला एक बाईचा आवाज स्पष्ट ऐकू आला – “फक्त माझी गोष्ट लोकांपर्यंत पोहोचव… मग मी निघून जाईन.” राहुलने धडधडत्या हृदयाने मान डोलावली. दरवाजा अचानक उघडला आणि तो धावत गावात परत आला.

    पुढच्या दिवशी राहुलने संपूर्ण अनुभव एका लेखात लिहिला – दुर्गा बाईचं दु:ख, तिचं अन्यायाने झालेलं मृत्यू, आणि तिचं आत्म्याचं तिथं अडकून राहणं. लेख व्हायरल झाला. अनेक लोकांनी दुर्गा वाड्याविषयी चर्चा सुरू केली.

    पण रात्री राहुलच्या लॅपटॉप स्क्रीनवर अचानक एक वाक्य झळकलं – “माझं ऐकलं… आता मी मुक्त आहे.” आणि एक क्षणभरासाठी त्याला ती बाई स्क्रीनच्या कोपऱ्यात पुन्हा दिसली… एक मंद स्मितहास्य करत.

    कथा संपली होती… की कदाचित नव्हती.

  • अंधेरे का घर

    अंधेरे का घर

    यह कहानी उत्तर भारत के एक छोटे से गाँव “चंद्रपुर” की है, जहाँ एक पुरानी वीरान हवेली पिछले 40 सालों से खंडहर बनकर खड़ी थी। कहते हैं, उस हवेली में रात के समय किसी के चीखने की आवाजें आती थीं। गाँव के बुजुर्ग कहते, “उस हवेली के अंदर अंधेरा नहीं, मौत रहती है।”

    कोई भी गाँववाला रात के समय उस हवेली के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था।

    एक दिन शहर से चार दोस्त – रोहित, कबीर, निधि और आयुष – गाँव में छुट्टियाँ मनाने आए। वे सभी कॉलेज में पढ़ते थे और हॉरर कहानियों के शौकीन थे। गाँव वालों से हवेली के बारे में सुनकर उनके अंदर एक अजीब सी जिज्ञासा जागी।

    रोहित ने कहा, “एक रात उस हवेली में चलकर देखते हैं, आखिर डर किस बात का है?”

    कबीर हँसते हुए बोला, “भूत-वूत कुछ नहीं होता, ये सब लोगों के दिमाग का वहम है।”

    निधि थोड़ी डरी हुई थी लेकिन दोस्तों के कहने पर मान गई। तय हुआ कि अगली रात वे सभी टॉर्च, कैमरा और कुछ खाने-पीने का सामान लेकर हवेली में जाएंगे।

    अगली रात ठीक 12 बजे, चारों दोस्त हवेली के पुराने दरवाजे को धक्का देकर अंदर घुसे। दरवाज़ा जोर से चरमराया और एक अजीब सी सड़न की गंध पूरे वातावरण में फैल गई। हवेली के अंदर अंधेरा, धूल और मकड़ियों का जाल था।

    दीवारों पर समय की मार साफ दिख रही थी। टॉर्च की रोशनी में उन्हें एक बड़ा हॉल दिखाई दिया जिसमें टूटी-फूटी कुर्सियाँ और एक पुराना झूमर लटक रहा था।

    आयुष ने हँसते हुए कहा, “ये तो एकदम फिल्मी सेट जैसा लग रहा है।”

    लेकिन तभी… एक धीमी सी सिसकी सुनाई दी।

    “सुनो… ये आवाज़ कहाँ से आई?” – निधि ने घबराते हुए पूछा।

    सभी चुप हो गए। उन्होंने फिर ध्यान से सुना – दीवारों के पीछे से किसी औरत के रोने की आवाज़ आ रही थी।

    रोहित ने हिम्मत दिखाते हुए उस दिशा में टॉर्च डाली। एक पुराना दरवाज़ा दिखा, जो थोड़ा खुला हुआ था। जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, एक ठंडी हवा का झोंका आया और सभी के रोंगटे खड़े हो गए।

    अंदर एक छोटा कमरा था – कमरे में एक पुराना झूला और ज़मीन पर एक टूटी हुई गुड़िया पड़ी थी। अचानक वह झूला अपने आप हिलने लगा।

    आयुष ने तुरंत सब कुछ कैमरे में रिकॉर्ड करना शुरू किया। तभी निधि की नज़र दीवार पर बनी एक पुरानी पेंटिंग पर पड़ी – उसमें एक औरत और एक छोटी बच्ची की तस्वीर थी। पर अजीब बात ये थी कि औरत की आँखों से लाल रंग की बूंदें जैसे बह रही हों।

    निधि ने धीरे से कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है जैसे ये औरत हमें देख रही है…”

    अचानक उसी वक्त झूले की आवाज़ बंद हो गई। सन्नाटा छा गया। और तभी – झूले के नीचे से किसी के पाँव दिखाई दिए।

    चारों दोस्त एक झटके में चौंक गए।

    अब उन्हें यकीन हो गया कि वहाँ कुछ था। वे भागकर हॉल की तरफ़ लौटे लेकिन रास्ता अजीब तरीके से बदल चुका था। जिससे वे अंदर आए थे, अब वहाँ एक दीवार थी।

    कबीर बोला, “ये कैसे हो सकता है? दरवाज़ा तो यहीं था!”

    हवेली अब बदल चुकी थी। दीवारों पर खून के निशान उभर आए थे और हर कोने से किसी के फुसफुसाने की आवाजें आ रही थीं।

    “तुमने हमें क्यों जगाया…?” एक फटी हुई औरत की आवाज़ गूंजी।

    रोहित को दीवार पर एक पुराना पेपर चिपका मिला। उसने पढ़ा –
    “1975 – इस हवेली की मालकिन सविता देवी और उनकी बेटी को उनके पति ने मार डाला था। कहते हैं, उनकी आत्मा आज भी न्याय की तलाश में भटक रही है। जो भी इस हवेली में आता है, उसे वे अपनी कहानी सुनाए बिना नहीं जाने देतीं।”

    तभी कमरे में वह औरत दिखाई दी – वही जो पेंटिंग में थी – लेकिन अब उसकी आँखों से खून टपक रहा था, और हाथों में एक बच्ची की टूटी गुड़िया थी।

    वह औरत धीरे-धीरे रोहित के पास आई और कहा, “क्या तुम मेरी मदद करोगे…? क्या मेरी कहानी दुनिया को बताओगे…?”

    रोहित काँपता हुआ बोला, “हाँ… हम तुम्हारी कहानी सबको बताएँगे… कृपया हमें जाने दो।”

    औरत ने हाथ आगे बढ़ाया, रोहित ने वह पेपर उसके हाथ में रखा। कुछ पल बाद हवेली की दीवारें फिर से सामान्य हो गईं, खून के निशान गायब हो गए और दरवाज़ा वापस अपनी जगह पर था।

    चारों दोस्त भागकर हवेली से बाहर निकले।

    अगली सुबह, रोहित ने इंटरनेट पर उस औरत की पूरी कहानी एक ब्लॉग में लिखी। पोस्ट का टाइटल था – “अंधेरे का घर – एक अधूरी आत्मा की पुकार”। कहानी वायरल हो गई। लोगों को पहली बार उस हवेली का सच पता चला।

    पर उस रात रोहित के लैपटॉप स्क्रीन पर अचानक एक लाइन अपने आप टाइप हुई –
    “धन्यवाद… अब मैं जा रही हूँ…”

    लेकिन स्क्रीन के कोने में वही औरत की धुंधली तस्वीर कुछ पल के लिए दिखी… और फिर गायब हो गई।

  • Local Eatery Celebrates Anniversary with Community Feast

    Local Eatery Celebrates Anniversary with Community Feast

    Beloved Local Eatery Marks Milestone with Special Event

    A popular neighborhood eatery recently celebrated a significant anniversary, marking years of serving the community with its delicious offerings and welcoming atmosphere. To commemorate the occasion, the establishment hosted a special community feast, expressing gratitude to its loyal patrons.

    A Day of Celebration and Gratitude

    The anniversary event was a vibrant affair, with festive decorations and a lively ambiance. The eatery offered a wide array of its signature dishes and some special additions to the menu for the day. The community responded enthusiastically, with residents of all ages turning out to partake in the celebration and congratulate the establishment on its milestone.

    Serving the Community for Years

    The eatery has become a beloved fixture in the local landscape, known not only for its quality food but also for its commitment to the community. Over the years, it has been a gathering place for families, friends, and neighbors, fostering a sense of belonging. The anniversary celebration was a testament to the strong bond between the establishment and the people it serves.

    Looking Towards the Future

    The owners of the eatery expressed their sincere appreciation for the continued support of the community and reaffirmed their commitment to providing quality food and a welcoming environment for years to come. They highlighted the importance of local businesses in fostering community spirit and expressed optimism for the future.

    The anniversary celebration served as a heartwarming reminder of the vital role local businesses play in the fabric of a community, bringing people together and contributing to the neighborhood’s charm and character.